
टेलीविजन के इतिहास में कुछ धारावाहिक ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। 1987 में प्रसारित हुई रामानंद सागर की ‘रामायण’ भी एक ऐसा ही शो है, जिसने न केवल धर्म और संस्कृति को घर-घर तक पहुंचाया, बल्कि इसके कलाकारों को भी समाज में भगवान वाला दर्जा हासिल हुआ। जहां भगवान राम और माता सीता की भूमिका निभाने वाले सितारे आज भी चर्चा के केंद्र में रहते हैं, वहीं इसी महागाथा के कुछ ऐसे भी चेहरे हैं जिन्होंने एक नहीं बल्कि कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, लेकिन समय के साथ वे चर्चाओं की मुख्य धारा से ओझल हो गए। इन्हीं गुमनाम नायकों में से एक प्रभावशाली नाम है विजय कविश का।
एक कलाकार अनेक रोल
रामानंद सागर की पारखी नजरों ने विजय कविश की बहुमुखी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें ‘रामायण’ में कई अहम जिम्मेदारियां सौंपीं। विजय कविश को सबसे ज्यादा लोकप्रियता भगवान शिव के शांत और दिव्य स्वरूप को निभाने के लिए मिली। उनकी गहरी आवाज और सौम्य चेहरे ने शिव के किरदार में एक अलग ही आकर्षण भर दिया था, लेकिन उनकी प्रतिभा केवल यहीं तक सीमित नहीं थी, उन्होंने इस महाकाव्य में रावण के पिता ऋषि विश्रवा की भूमिका भी शानदार तरीके से निभाई। इसके अलावा जब उत्तर रामायण का प्रसारण हुआ तो उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के रूप में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। एक ही शो में इतने बिल्कुल अलग-अलग स्वभाव वाले किरदारों को पूरी संजीदगी के साथ जीना विजय कविश की अभिनय कला का प्रमाण था।
विजय कविश।
मनोरंजन के अन्य मंचों पर योगदान
‘रामायण’ की अपार सफलता से पहले और बाद में भी विजय कविश अभिनय की दुनिया में सक्रिय रहे। साल 1985 में उन्होंने फिल्म ‘सलमा’ के जरिए बड़े पर्दे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके अलावा रामानंद सागर के कई और धारावाहिकों जैसे ‘विक्रम और बेताल’ और ‘श्रीकृष्णा’ में भी उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाकर दर्शकों का मनोरंजन किया। हालांकि इन ऐतिहासिक और पौराणिक शो के बाद उन्हें वह पहचान या अवसर नहीं मिले जो उनके अनुभव और कौशल के अनुरूप होने चाहिए थे। धीरे-धीरे वह अभिनय की चकाचौंध से दूर होते गए, लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ।
वर्तमान जीवन और डिजिटल बदलाव
आज के दौर में जहां तकनीक ने मनोरंजन की परिभाषा बदल दी है, विजय कविश ने भी खुद को समय के साथ ढाला है। भले ही आज वह बड़े बैनर की फिल्मों या प्राइम टाइम टीवी शो का हिस्सा न हों, लेकिन वह मुंबई में एक डायरेक्टर और एडिटर के तौर पर अपनी रचनात्मक पारी खेल रहे हैं। वह यूट्यूब जैसे आधुनिक माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं, जहां वह अपनी शॉर्ट फिल्में और वेब सीरीज साझा करते हैं। हालांकि यह उनके जीवन का एक चुनौतीपूर्ण चरण है क्योंकि इंडस्ट्री में उनकी पहचान अब पहले जैसी नहीं रही, लेकिन उनका संघर्ष और हार न मानने वाला जज्बा उन्हें आज भी कैमरा और एडिटिंग टेबल से जोड़े हुए है।
लुक में बदलाव और एक अनकहा संघर्ष
वक्त के साथ विजय कविश के व्यक्तित्व में भी बड़ा बदलाव आया है। उम्र के इस पड़ाव पर उनका लुक अब पूरी तरह बदल चुका है, जिससे ‘रामायण’ के भगवान शिव के रूप में उन्हें आज पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है। उनकी कहानी उन तमाम कलाकारों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम युग की नींव रखी, लेकिन खुद कहीं पीछे छूट गए। विजय कविश का योगदान भले ही आज चर्चाओं का हिस्सा न हो, मगर जब भी ‘रामायण’ का गौरवशाली इतिहास याद किया जाएगा, उनके निभाए गए उन कालजयी किरदारों की गूंज हमेशा सुनाई देगी। उनका सफर हमें यह सिखाता है कि सफलता के शिखर से लेकर संघर्ष की ढलानों तक एक कलाकार का असली धर्म अपनी कला को जीवित रखना ही है।
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