
संजय मिश्रा
संजय मिश्रा और नीना गुप्ता इन दिनों अपनी फिल्म ‘वध 2’ को लेकर जबरदस्त चर्चा में बने हुए हैं, जिसे लोगों से मिले-जुले रिव्यू मिल रहे हैं। हालांकि, आज भी लोग दिग्गज अभिनेता संजय मिश्रा को मशहूर टीवी सीरियल ‘ऑफिस ऑफिस’ में करप्ट कर्मचारी शुक्ला के रोल के लिए याद करते हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि आजकल देश में टेलीविजन बहुत ही बेवकूफी भरा मीडियम बन गया है। टीवी के लिए काम कर चुके संजय ने यह भी खुलासा किया कि उन्हें सास-बहू का ड्रामा क्यों नहीं पसंद है। साथ ही यह भी बताया कि 2001 के बाद टेलीविजन का क्या हाल हो गया है।
टेलीविजन इंडस्ट्री में काम नहीं करना चाहते एक्टर
संजय मिश्रा ने प्रखर गुप्ता के शो रॉ एंड रियल के यूट्यूब पॉडकास्ट में बताया, ‘मुझे लगता है कि भारत में टेलीविजन बहुत ही बेवकूफी भरा, मूर्खतापूर्ण मीडियम बन गया है… मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मुझे अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए फिर से टेलीविजन न करना पड़े। हमने एक बहुत ही पॉजिटिव मीडिया को बहुत ही नेगेटिव बना दिया है… चाहे वह फिक्शन हो या नॉन-फिक्शन टीवी।’
सास-बहू ड्रामा की क्या है खामियां
संजय मिश्रा ने टीवी जगत के हालत के बारे में बात करते हुए कहा, ‘ऑफिस ऑफिस के बाद टेलीविजन इंडस्ट्री खराब हो गया कि ऐसी दुखती रग पकड़ों महिलाओं का बहू को आग लगा दो, बेटा वहां है वो मां बन गई… तुलसी में पानी नहीं दिया। ऐसे दुखती रग पकड़ लो।’ एक्टर ने आगे कहा कि आप समाज को जो दिखा रहे हैं वो सही है या नहीं यह भी जरूरी है क्योंकि घर में आग लगना गलत है। उन्होंने आगे कहा, ‘ऑफिस ऑफिस, भारत एक खोज एक अच्छा काम था। मैं उस वक्त भी कहता था कि सिनेमा और टीवी को समझा चाहिए। ये दोनों बहुत बड़ी ताकत है। आप क्रांति ला सकते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि 2001 के बाद हमने एक बेहद सकारात्मक माध्यम को नकारात्मक बना दिया है, जो टीवी था।
संजय मिश्रा की जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर
2000 के दशक में ‘ऑफिस ऑफिस’ की शूटिंग के दौरान संजय मिश्रा को पेट में इन्फेक्शन हो गया और वे बहुत बीमार पड़ गए। शुरुआत में यह एक सामान्य इन्फेक्शन लग रहा था, लेकिन जब उनकी तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी तो संजय को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उनके पेट से 15 लीटर पस निकाला और एक्टर को कुछ हफ्तों तक काम न करने की सलाह दी गई। यह उनकी जिंदगी का बहुत मुश्किल दौर था, क्योंकि वे पहले से ही किराया देने के लिए संघर्ष कर रहे थे और ऊपर से हॉस्पिटल के भारी-भरकम बिलों ने उनके कंधों पर और भी बोझ डाल दिया था।
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