
फिल्म से एक सीन।
भारतीय सिनेमा में होली का त्योहार केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भावनाओं और सुरों का एक महासंगम रहा है। आज ‘रंग बरसे’ या ‘बलम पिचकारी’ जैसे गानों के बिना होली अधूरी लगती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्मी पर्दे पर इस रंगीन सफर की शुरुआत कब और कैसे हुई? बॉलीवुड में होली गीतों का इतिहास आजादी से भी पहले का है और इसे शुरू करने का श्रेय एक महान फिल्ममेकर को जाता है। दरअसल ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में ही रंग भरी सौगात लोगों को मिली थी।
महबूब खान थे होली के ट्रेंडसेटर
हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहला होली गीत 1947 से भी काफी पहले साल 1940 में रिलीज हुआ था। दिग्गज फिल्ममेकर महबूब खान ने अपनी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘औरत’ के जरिए सिल्वर स्क्रीन पर होली के दृश्यों को पेश करने की परंपरा शुरू की। उस दौर में फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थीं, लेकिन महबूब खान ने अपनी कल्पनाशीलता से दर्शकों को रंगों के इस त्योहार का एहसास कराया। महबूब खान वही निर्देशक हैं जिन्होंने बाद में भारतीय सिनेमा की अमर कृति ‘मदर इंडिया’ बनाई थी जो वास्तव में उनकी इसी फिल्म ‘औरत’का रीमेक थी।
एक ही फिल्म में दो होली गीतों का धमाका
फिल्म ‘औरत’ की खास बात यह थी कि इसमें होली को समर्पित एक नहीं, बल्कि दो गाने शामिल किए गए थे। उस समय की संगीत शैलियों को ध्यान में रखते हुए ये गीत काफी लोकप्रिय हुआ।’आज होली खेलेंगे सजन के संग’, इसे हिंदी सिनेमा का पहला होली गीत माना जाता है। इस गाने को मशहूर संगीतकार अनिल बिस्वास ने न केवल संगीतबद्ध किया था, बल्कि अपनी आवाज भी दी थी। इसके बोल सफदर आह ने लिखे थे। ‘जमुना तट पर होली खेलत श्याम’, इसी फिल्म का यह दूसरा गीत भगवान कृष्ण और राधा की पारंपरिक होली पर आधारित था। इसे विनय बिहारी ने लिखा था। इन गानों ने उस जमाने में जबरदस्त धूम मचाई थी और यह साबित कर दिया था कि होली का जश्न पर्दे पर भी दर्शकों को उतना ही रोमांचित कर सकता है जितना असल जिंदगी में।
यहां देखें गाना
आजादी से पहले की एक ऐतिहासिक कृति
फिल्म ‘औरत’ 1940 में रिलीज हुई थी, जो उस समय के ग्रामीण भारत और एक महिला के संघर्ष की कहानी थी। इस फिल्म में सरदार अख्तर, सुरेंद्र, याकूब, कन्हैयालाल और अरुण कुमार आहूजा (अभिनेता गोविंदा के पिता) जैसे कलाकारों ने अभिनय किया था। अनिल बिस्वास के संगीत और वजाहत मिर्जा के संवादों ने इस फिल्म को एक मील का पत्थर बना दिया था। महबूब खान ने न केवल होली का ट्रेंड शुरू किया, बल्कि बाद में फिल्मों में रंगीन तकनीकी (Technicolor) लाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई।
विरासत जो आज भी जारी है
महबूब खान द्वारा बोया गया यह बीज आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है। ‘औरत’ के इन गानों के बाद बॉलीवुड में होली गीतों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई। दशकों बाद अमिताभ बच्चन के ‘रंग बरसे’ (सिलसिला), ‘होली खेले रघुवीरा’ (बागबान) और शोले का ‘होली के दिन’ जैसे गानों ने इस परंपरा को अमर कर दिया। आधुनिक दौर में भी ‘बलम पिचकारी’ और ‘डू मी अ फेवर लेट्स प्ले होली’ जैसे गाने इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। आज जब हम होली के हुड़दंग में फिल्मी गानों पर थिरकते हैं तो हमें 1940 की उस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘औरत’ को जरूर याद करना चाहिए, जिसने रंगों की इस सुरीली यात्रा की पहली ईंट रखी थी।
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