
भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता प्रकाश राज की मां सुवर्णलता का रविवार सुबह बेंगलुरु स्थित उनके निवास पर निधन हो गया। वह 86 साल की थीं। उनका अंतिम संस्कार रविवार शाम को ही संपन्न किया गया। सुवर्णलता का जाना न केवल प्रकाश राज के परिवार के लिए, बल्कि उनके प्रशंसकों के लिए भी एक काफी दुखद क्षण है। इंडस्ट्री से लोग प्रकाश राज के साथ खड़ें हैं और उन्हें सांतवना दे रहे हैं।
एक मां का संघर्ष और प्रकाश राज की प्रेरणा
सुवर्णलता जी प्रकाश राज के जीवन का सबसे मजबूत स्तंभ थीं। अभिनेता ने अपने कई साक्षात्कारों में इस बात का जिक्र किया है कि उनका बचपन काफी संघर्षपूर्ण रहा था। उनके पिता के शराब की लत में डूबे होने के कारण घर की पूरी जिम्मेदारी उनकी माता के कंधों पर आ गई थी। उन्होंने अकेले दम पर न केवल घर चलाया, बल्कि अपने बच्चों को वह संस्कार और मजबूती दी, जिसने प्रकाश राज को आज इस मुकाम तक पहुँचाया है। एक अकेले वित्तीय और भावनात्मक लंगर के रूप में सुवर्णलता जी की शक्ति ने प्रकाश राज के व्यक्तित्व और उनके अभिनय कौशल पर अमिट छाप छोड़ी है। वे अक्सर अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां के उसी अटूट धैर्य और साहस को देते रहे हैं।
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राजनीतिक और सिनेमा जगत में शोक
इस दुखद समाचार के मिलते ही सोशल मीडिया पर शोक संवेदनाओं का तांता लग गया। आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण उन शुरुआती हस्तियों में शामिल थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से अपना दुख व्यक्त किया। पवन कल्याण के कार्यालय ने आधिकारिक संदेश साझा करते हुए लिखा, ‘प्रसिद्ध अभिनेता प्रकाश राज की माता सुवर्णलता जी के निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुख हुआ है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि उनकी आत्मा को शाश्वत शांति मिले। मैं श्री प्रकाश राज गारू और उनके पूरे परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं, जो इस समय अपनी माता को खोने के शोक में डूबे हैं।’ प्रशंसकों और फिल्म जगत के साथियों ने भी इस कठिन समय में अभिनेता को संबल देने के लिए संदेश भेजे हैं।
प्रकाश राज की लाइफ
प्रकाश राज भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा अभिनेताओं में से हैं, जिन्होंने कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों में अपनी अमिट पहचान बनाई है। पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके प्रकाश राज ने 400 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है और उन्हें देश के सबसे बहुमुखी अभिनेताओं में से एक माना जाता है। सिनेमा के पर्दे से परे, वे अपने मुखर सामाजिक कार्यों और सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं, जिसमें तेलंगाना के महबूबनगर जिले के एक गांव को गोद लेना भी शामिल है। हालांकि, सफलता के इस शिखर तक पहुंचने के दौरान उन्होंने कई व्यक्तिगत दुखों का भी सामना किया है। साल 2004 में उन्होंने अपने पांच वर्षीय बेटे सिद्धू को खो दिया था, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा आघात था। अब 86 वर्ष की आयु में उनकी माता का निधन उनके जीवन का एक और दर्दनाक अध्याय है।
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