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थम गई सुरों का जादू बिखेरने वाली ‘आशा’, 70 सालों तक म्यूजिक के हर ट्रेंड में बरकरार रहा जलवा

थम गई सुरों का जादू बिखेरने वाली ‘आशा’, 70 सालों तक म्यूजिक के हर ट्रेंड में बरकरार रहा जलवा

Asha Bhosle Songs : आशा भोसले भारतीय सिनेमा और संगीत जगत की एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने अपनी अनोखी आवाज और अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा से लाखों दिलों पर राज किया। 8 सितंबर 1933 को सांगली (महाराष्ट्र) में जन्मीं आशा भोसले के संगीत का सफर 1940 के दशक के अंत से शुरू हुआ था। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका आज निधन हो गया। आठ दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में 12,000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए, जिसके लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने उन्हें सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने वाले कलाकार के रूप में मान्यता दी। 

संघर्षों के बीच अपनी पहचान बनाने का जुनून 

आशा भोसले का करियर शुरूआत में चुनौतीपूर्ण रहा। बड़े परिवार में छोटी बहन के रूप में वे अपनी बड़ी बहन लता मंगेश्कर की छाया में रहीं, लेकिन उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाने का फैसला किया। शुरू में उनकी आवाज लता जी से काफी मिलती-जुलती थी, इसलिए उन्होंने जानबूझकर अपनी स्टाइल को बदल लिया। उन्होंने पश्चिमी प्रभाव वाले गानों में अपनी आवाज को ज्यादा बोल्ड, सेक्सी और एनर्जेटिक बनाया, जिससे वे कैबरे, डिस्को, पॉप और आधुनिक गानों की क्वीन बन गईं।

शरारत और अदाओं की शाश्वत गायिका 

 आशा भोसले के करियर का ब्रेकथ्रू 1957 में ओ.पी. नैय्यर के साथ आया। फिल्म ‘नया दौर’ का गाना “उड़े जब जब जुल्फें तेरी” हिट हुआ। इसके बाद ओ.पी. नैय्यर, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन और खय्याम जैसे संगीतकारों के साथ उन्होंने अमर गीत दिए। 1960-70 के दशक में आर.डी. बर्मन (पंचम) के साथ उनकी जोड़ी ने जादू रचा। “पिया तू अब तो आ जा” (कारवां), “डम मारो डम” (हरे राम हरे कृष्ण), “चुरा लिया है तुमने जो दिल को” (या यादों की बारात), “ये लड़का हाय अल्लाह” (हम किसी से कम नहीं) और “ये मेरा दिल यार का दीवाना” (डॉन) जैसे गाने आज भी युवा पीढ़ी को झूमने पर मजबूर करते हैं। 

बहुमुखी प्रतिभा की धनी 

आशा जी की सिंगिंग स्टाइल उनकी सबसे बड़ी ताकत रही। लता मंगेश्कर की कोमल, भावपूर्ण और शुद्ध स्वर वाली आवाज के विपरीत आशा की आवाज में एक अनोखी ऊर्जा, सुरीली टोन और प्रयोगधर्मिता है। वे क्लासिकल ग़ज़लों से लेकर लोक, भजन, कव्वाली, फोक और वेस्टर्न डिस्को तक हर विधा में माहिर रहीं। फिल्म ‘उमराव जान’ (1981) में खय्याम के साथ “दिल चीज क्या है” और “इन आंखों की मस्ती” जैसी ग़ज़लें गाकर उन्होंने साबित कर दिया कि वे सिर्फ आइटम सॉन्ग्स तक सीमित नहीं हैं। इन्हीं गानों के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला। दूसरा नेशनल अवॉर्ड “मेरा कुछ सामान” (इजाजत) के लिए मिला। 

स्वरकोकिला के साथ सुरों की जादूगरनी 

स्वरकोकिला लता मंगेश्कर और उनकी बहन आशा भोसले दोनों की आवाजें अलग-अलग लेकिन पूरक रहीं। लता जी को ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ कहा जाता है तो आशा जी को ‘वर्सेटाइल क्वीन।’ उन्होंने फिल्मों में लगभग 70-80 डुएट और ग्रुप सॉन्ग्स साथ गाए। प्रसिद्ध डुएट्स में “मन क्यों बेहका रे बेहका” (उत्सव), “मैं चली मैं चली” (पड़ोसन), “पिंगा” (बाजीराव मस्तानी) और कई अन्य शामिल हैं। शुरू में प्रतिस्पर्धा रही, लेकिन बाद में दोनों ने एक-दूसरे की तारीफ की। आशा जी ने कहा कि लता दीदी से अलग स्टाइल अपनाकर उन्होंने अपनी जगह बनाई। 

पुरस्कार और सम्मान 

दिग्गज गायिका आशा भोसले ने न सिर्फ हिंदी बल्कि बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल आदि भाषाओं में भी गाया। उन्होंने 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स (रिकॉर्ड 7 बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर), दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड (2000), पद्म विभूषण (2008) और कई अन्य सम्मान प्राप्त किए।

युवाओं के बीच आशा ताई का क्रेज 

जब-जब आशा ताई ने स्टेज पर परफॉर्म किया उनके सुरों का जादू युवाओं के सिर चढ़कर बोलता था। उनका जलवा म्यूजिक के हर बदलते ट्रेंड में बरकरार रहा और नई पीढ़ी के गायकों को प्रेरित करता रहा। उनकी यात्रा सिर्फ गानों की नहीं, बल्कि साहस, प्रयोग और समर्पण की मिसाल है। आशा भोसले ने साबित किया कि प्रतिभा अगर सही दिशा में लगे तो कोई सीमा नहीं रहती। 

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