
फिल्म निर्माता हनी त्रेहन ने एक हालिया इंटरव्यू में अभिनेता और मशहूर एक्टर और सिंगर दिलजीत दोसांझ को लेकर एक बेहद भावुक और बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि फिल्म ‘सतलुज’ में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की मुख्य भूमिका निभाने के लिए दिलजीत ने एक अनोखी मिसाल पेश की। दिलजीत का मानना था कि पंजाब के इतने बड़े नायक का किरदार निभाने के लिए किसी भी तरह का व्यावसायिक लाभ लेना उनके सिद्धांतों के खिलाफ होगा। निर्देशक ने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए दिलजीत ही उनकी पहली और एकमात्र पसंद थे, जिनके बिना इस फिल्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। फिल्म निर्माता हनी त्रेहन ने बताया कि अभिनेता और मशहूर सिंगर दिलजीत दोसांझ ने फिल्म ‘सतलुज’ में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की भूमिका निभाने के लिए महज 1 रुपये की टोकन फीस ली थी।
क्यों दिलजीत ने नहीं ली फीस?
द प्रिंट के साथ से बातचीत के दौरान निर्देशक हनी त्रेहन ने साल 2021 में दिलजीत दोसांझ के साथ हुई अपनी पहली मुलाकात को याद किया। उन्होंने बताया कि वे दिलजीत से सिर्फ 30 मिनट के लिए मिले थे और उन्होंने अपनी रिसर्च के सारे दस्तावेज उनके सामने रख दिए थे। जैसे ही दिलजीत ने जसवंत सिंह खालरा की तस्वीर और उनके संघर्षों की कहानी देखी, वह दंग रह गए और उन्होंने तुरंत इस फिल्म के लिए कोई भी फीस न लेने का फैसला कर लिया। उस भावुक पल को याद करते हुए 47 वर्षीय निर्देशक ने बताया, ‘दिलजीत अपनी कुर्सी से खड़े हो गए, उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट को अपने माथे से लगाया और पूरी श्रद्धा के साथ ‘वाहेगुरु’ कहा। उन्होंने मुझसे कहा कि खालरा साहब जैसे महान व्यक्तित्व का किरदार निभाने के लिए मैं पैसे कैसे ले सकता हूं? ऐसा करना बहुत शर्मनाक होगा।’ हनी त्रेहन ने जब उन्हें व्यावसायिक तौर पर भुगतान करने की जिद की तो दिलजीत ने कहा कि अगर कागजी और कानूनी प्रक्रियाओं के लिए पैसों का लेनदेन जरूरी है तो उन्हें मानदेय के रूप में सिर्फ 1 रुपया दे दिया जाए।
बॉलीवुड अभिनेताओं को न चुनने की असली वजह
निर्देशक ने इस बात पर जोर दिया कि वह इस भूमिका के लिए किसी ऐसे कलाकार को चाहते थे जो पंजाब की उस दौर की जमीनी हकीकत और वहां की संस्कृति को गहराई से समझता हो। उन्होंने कहा, ‘मैं इस किरदार के लिए एक सच्चे सरदार अभिनेता को ही कास्ट करना चाहता था। अगर मैं बॉलीवुड के किसी बड़े मुख्यधारा के अभिनेता को यह रोल देता तो दर्शकों का ध्यान कहानी से भटककर इस बात पर चला जाता कि कोई खास अभिनेता एक सरदार का रोल कर रहा है। ऐसा करना खालरा साहब के संघर्षों और उस दौर के पीड़ितों के दर्द के साथ सरासर नाइंसाफी होती।’
रिलीज के 48 घंटे भीतर फिल्म पर लगा प्रतिबंध और विवाद
दुर्भाग्य से फिल्म ‘सतलुज’ को अपनी रिलीज के बाद से ही लगातार बड़े अवरोधों का सामना करना पड़ा है। बिना किसी पूर्व प्रचार के 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज होने के महज 48 घंटों के भीतर इस फिल्म को भारत में ब्लॉक कर दिया गया था। इसके बाद इसे वैश्विक स्तर पर भी प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया और यहां तक कि इसकी आईएमडीबी रेटिंग्स भी गायब कर दी गईं। यह फिल्म शुरुआत में ‘पंजाब 95’ के नाम से बनाई जा रही थी, जिस पर सेंसर बोर्ड ने 127 कट लगाने के निर्देश दिए थे। साल 2023 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) में भी इसके प्रीमियर को भारतीय अधिकारियों की आपत्तियों के बाद रद्द कर दिया गया था। फिलहाल इस फिल्म को ओटीटी पर बहाल करने और इसे हटाने के कारणों को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह फिल्म पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान हुए कथित फर्जी एनकाउंटरों और अवैध सामूहिक दाह-संस्कारों के खिलाफ जसवंत सिंह खालरा के ऐतिहासिक संघर्ष पर आधारित है।
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