
एक्टर दिलजीत दोसांझ की राजनीतिक ड्रामा फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर बवाल छिड़ा हुआ है। दरअसल फिल्म को जी5 पर रिलीज किया गया था और दो दिन के भीतर ही इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा भी दिया गया। ऐसा होते ही विवाद गहराने लगा। अब इस मामले पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने अपना रिएक्शन दिया और इसके साथ ही बताया कि वो फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की कड़ी निंदा करते हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कहानी को दबाने का प्रयास करार दिया है। सिख समुदाय में बढ़ते गुस्से को देखते हुए कमेटी ने अब इस फिल्म को खुद जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। इसके तहत देश भर में फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग की जाएगी और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष सेमिनार आयोजित किए जाएंगे।
सिख कमेटी का रुख और आगामी योजनाएं
यह फिल्म पंजाब में 1980 और 1990 के दशक में हुए उग्रवाद और पुलिस ऑपरेशनों के दौरान मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करने वाले जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने फिल्म को हटाए जाने की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि जसवंत सिंह खालरा एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्होंने सच्चाई से दुनिया का सामना कराया। उन्होंने पंजाब के उस दौर में 25000 अज्ञात शवों के अवैध रूप से दाह संस्कार किए जाने के पुख्ता सबूत जुटाए थे और इस गंभीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया था। कालका के अनुसार ऐसी ऐतिहासिक और सच्चाई बयां करने वाली कहानी को जनता के बीच जाने से रोकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। सिख समुदाय की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कमेटी ने सभी गुरुद्वारा सदस्यों को फिल्म डाउनलोड कर अपने-अपने क्षेत्रों में दिखाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही युवाओं को जागरूक करने के लिए कमेटी के अधीन आने वाले स्कूलों और कॉलेजों में जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके योगदान पर सेमिनार आयोजित किए जाएंगे।
क्या है ‘सतलुज’ की कहानी?
हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सतलुज‘ में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा की मुख्य भूमिका निभाई है। कहानी एक साधारण बैंक क्लर्क से मानवाधिकार कार्यकर्ता बने खालरा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्होंने पंजाब के अशांत दौर में पुलिस द्वारा किए गए कथित फर्जी एनकाउंटर और गुप्त रूप से शवों को ठिकाने लगाने के काले सच को बेनकाब किया था। साल 1995 में खालरा रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गए थे। इसके एक दशक बाद अदालत ने पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को उनके अपहरण, उत्पीड़न और हत्या का दोषी पाया था, हालांकि उनका शव कभी बरामद नहीं हो सका।
फिल्म से जुड़ा विवाद और सेंसरशिप
इस फिल्म का सफर शुरुआत से ही विवादों से घिरा रहा है। मूल रूप से ‘पंजाब 95’ नाम से बनी इस फिल्म को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी पाने के लिए लगभग चार साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसमें बोर्ड ने करीब 120 कट्स लगाने की मांग की थी। न कोई प्रमोशन रखा गया, न इस फिल्म का कोई ट्रेलर आया, बीते शुक्रवार को फिल्म को बिना किसी कट के नए नाम ‘सतलुज’ के साथ अचानक जी5 पर रिलीज कर दिया गया, लेकिन महज दो दिन बाद रविवार को इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिसके पीछे स्ट्रीमिंग कंपनी ने कुछ बदलावों का हवाला दिया। सूत्रों के मुताबिक फिल्म को आईटी नियमों के उल्लंघन के चलते हटाया गया है। आरएसवीपी और मैकगफिन पिक्चर्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में दिलजीत के अलावा अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह और सुविंदर विक्की जैसे कलाकारों ने अहम भूमिकाएं निभाई हैं।
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