
80 के दशक का भारतीय टेलीविजन मनोरंजन का एक ऐसा अध्याय है, जहां कम संसाधनों और सीमित तकनीक के बावजूद कहानियों की ताकत और कलाकारों के दमदार अभिनय ने इतिहास रच दिया था। उस समय दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक आज भी लोगों की दिमाग में अमिट छाप छोड़ते हैं। वह एक ऐसा युग था जब टेलीविजन शो केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि पूरे परिवार के एक साथ जुड़ने का बहाना हुआ करते थे। इसी दौर में एक ऐसा शो आया जिसने सस्पेंस, फैंटेसी और रोमांच का ऐसा अनूठा मिश्रण पेश किया। आज आपको एक ऐसे ही शो से परिचित कराएंगे, जिसे ‘रामायण’-‘महाभारत’ के निर्देशक रामानंद सागर ने बनाया था, लेकिन ये शो बिल्कुल अलग था।
रामानंद सागर के विजन और शानदार एक्टर्स
इस ऐतिहासिक शो के पीछे महान निर्माता रामानंद सागर का विजन था, जबकि निर्देशन की कमान उनके बेटे प्रेम सागर ने संभाली थी। यह शो इसलिए भी खास था क्योंकि इसमें उन दिग्गज कलाकारों की फौज नजर आई थी, जिन्होंने आगे चलकर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्यों के जरिए घर-घर में अपनी पहचान बनाई। हम बात कर रहे हैं साल 1985 में प्रसारित हुए कालजयी धारावाहिक ‘विक्रम और बेताल’ की। इस शो में अरुण गोविल, सुनील लहरी, दीपिका चिखलिया और अरविंद त्रिवेदी जैसे सितारों ने अलग-अलग कहानियों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यह शो न केवल अपनी भव्यता के लिए, बल्कि अपनी अनूठी कास्टिंग के लिए भी जाना जाता है।
राजा विक्रमादित्य और बेताल के रहस्यों का सफर
भारतीय लोककथाओं पर आधारित ‘विक्रम और बेताल’ की संरचना बेहद दिलचस्प थी। कुल 26 कड़ियों वाले इस धारावाहिक की हर कहानी राजा विक्रमादित्य के साहस और बेताल के पेचीदा सवालों के इर्द-गिर्द घूमती थी। बेताल का वह डरावना रूप, उसकी पीठ पर लटकने का अंदाज और वह मशहूर शर्त’अगर तू बोला तो मैं चला’, आज भी उस दौर के दर्शकों के जहन में ताजा है। बच्चों के लिए जहां बेताल का गेटअप किसी हॉरर फिल्म जैसा रोमांच पैदा करता था, वहीं हर एपिसोड के अंत में राजा द्वारा दिया गया न्यायपूर्ण उत्तर समाज के लिए एक बड़ा नैतिक संदेश छोड़ जाता था।
शानदार रेटिंग और डिजिटल युग में मौजूदगी
41 साल पहले शुरू हुए इस शो की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इसे IMDb पर 8.3 जैसी शानदार रेटिंग मिली हुई है। इसने न केवल उस दौर में टीआरपी के तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त किए, बल्कि 90 के दशक तक यह सबसे चर्चित फैंटेसी-हॉरर ड्रामा बना रहा। तकनीक के अभाव में भी जिस तरह से बेताल के गायब होने और उड़ने के दृश्यों को फिल्माया गया था, वह उस समय के हिसाब से काफी प्रभावी था।
आज भी प्रासंगिक है यह क्लासिक शो
भले ही आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की भरमार है, लेकिन ‘विक्रम और बेताल’ जैसी कहानियों की सादगी और गहराई आज भी दर्शकों को आकर्षित करती है। अच्छी बात यह है कि यह क्लासिक शो आज के डिजिटल दौर में भी लुप्त नहीं हुआ है। दर्शक इस पुराने अनमोल रत्न को यूट्यूब पर प्रसार भारती के आधिकारिक चैनल के अलावा एमएक्स प्लेयर और जियो सिनेमा जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर देख सकते हैं।
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