
सिनेमा के पर्दे पर जब अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी लौटती है तो दर्शकों को हंसी के उस सैलाब की उम्मीद होती है जो ‘हेरा फेरी’ और ‘भूल भुलैया’ जैसी फिल्मों ने पैदा किया था। ‘भूत बंगला’ रिलीज तो हो गई, अक्षय की कॉमिक टाइमिंग ने तालियां भी बटोरीं और सिनेमाघर ठहाकों से गूंज भी उठे, लेकिन फिल्म खत्म होते-होते दिल के किसी कोने में एक खालीपन सा रह जाता है। फिल्म देखते वक्त बार-बार यह अहसास होता है कि सब कुछ होने के बावजूद कुछ बहुत बड़ा मिसिंग है। एक ऐसी पैनी नजर, एक ऐसी कलम जो साधारण से दृश्य को भी कल्ट बना देती थी, इस बार कहीं नजर नहीं आई। फिल्म के निर्देशन और अभिनय में तो दम है पर वह जादुई स्पर्श गायब है जो एक औसत फिल्म को इतिहास के पन्नों में दर्ज करवा देता है। आखिर कौन है वह शख्स, जिसकी कमी आज हर सिनेमा प्रेमी को खल रही है?
कॉमेडी के उस असली ‘शहंशाह’ की कमी
जैसे ही फिल्म का स्क्रीनप्ले ढीला पड़ता है, वैसे ही हर किसी के जेहन में एक ही नाम आता है नीरज वोरा। आज ‘भूत बंगला’ देखते वक्त यह ख्याल आना लाजिमी है कि अगर आज नीरज वोरा जिंदा होते तो इस फिल्म का हश्र कुछ और ही होता। नीरज वोरा सिर्फ एक लेखक या अभिनेता नहीं थे, बल्कि वह कॉमेडी के उस व्याकरण के रचयिता थे, जिसे प्रियदर्शन ने पर्दे पर उतारा। नीरज वोरा ने ‘हेरा फेरी’, ‘भूल भुलैया’, ‘गरम मसाला’, ‘फिर हेरा फेरी’ और ‘आवारा पागल दीवाना’ जैसी फिल्मों का स्क्रीनप्ले और संवाद लिखकर भारतीय कॉमेडी सिनेमा की दिशा बदल दी थी। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह किरदारों की भीड़ में भी हर एक को एक अनोखी पहचान दे देते थे। ‘भूल भुलैया’ में अगर अक्षय कुमार का किरदार आज भी याद किया जाता है तो उसकी एक बड़ी वजह नीरज वोरा के लिखे हुए वे चुटीले संवाद और सधा हुआ स्क्रीनप्ले था।
नीरज वोरा।
अगर नीरज वोरा लिखते स्क्रीनप्ले तो क्या बदल जाता?
‘भूत बंगला’ में सबसे बड़ी कमी इसके बिखरे हुए स्क्रीनप्ले में नजर आती है। फिल्म का पहला भाग तो शानदार है, लेकिन दूसरे भाग में कहानी अपनी दिशा खोने लगती है। अगर यहां नीरज वोरा होते तो वह फिल्म के हॉरर और कॉमेडी के बीच ऐसा संतुलन बिठाते कि डर के बीच भी हंसी का तड़का फीका नहीं पड़ता। लॉजिक और मैजिक का मेल देखने को मिलता। ‘भूल भुलैया’ में उन्होंने जिस तरह अंधविश्वास को मनोविज्ञान से जोड़ा था, वह उनकी तार्किक सोच का कमाल था। ‘भूत बंगला’ की कमजोर कड़ियों और तर्कों की कमी को वह अपनी कलम से दुरुस्त कर देते। किरदारों का विस्तार भी बेहतर होता। फिल्म में राजपाल यादव और परेश रावल जैसे दिग्गजों के पास करने को बहुत कुछ था, लेकिन स्क्रिप्ट की सीमा ने उन्हें बांध दिया। नीरज वोरा हर किरदार को मीम-मटेरियल बनाने की कला जानते थे।
कब हुई नीरज वोहरा की मौत?
बहुमुखी प्रतिभा के धनी नीरज वोरा का निधन 14 दिसंबर 2017 को मुंबई के एक अस्पताल में हुआ था। वे लगभग 13 महीनों तक कोमा में रहे थे। साल 2016 में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक और दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनके दोस्त फिरोज नाडियाडवाला ने अपने घर के एक हिस्से को अस्पताल में तब्दील कर उनकी सेवा की थी, लेकिन अंत में मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण उनका निधन हो गया। नीरज वोरा के बिना बॉलीवुड कॉमेडी अधूरी मानी जाती है। उन्होंने ‘हेरा फेरी’, ‘गोलमाल’, ‘भूल भुलैया’, ‘गरम मसाला’, ‘आवारा पागल दीवाना’, ‘खट्टा मीठा’, ‘चुप चुप के’, ‘भागम भाग’, ‘दीवाने हुए पागल’, ‘हंगामा’ और ‘अजनबी’ जैसी फिल्मों का कालजयी स्क्रीनप्ले लिखा। बतौर निर्देशक उन्होंने ‘फिर हेरा फेरी’ जैसी कल्ट क्लासिक फिल्म दी। अभिनय में भी ‘रंगीला’ और ‘बादशाह’ जैसे किरदारों से उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी।
कल्ट क्लासिक बनने से चूकी फिल्म
प्रियदर्शन ने पूरी कोशिश की, अक्षय ने अपनी जान झोंक दी, लेकिन ‘भूत बंगला’ वह मुकाम हासिल नहीं कर पाई जो ‘भूल भुलैया’ ने किया था। नीरज वोरा का असमय जाना फिल्म जगत के लिए एक ऐसा घाव है जो आज ‘भूत बंगला’ की कमजोर पटकथा देखकर फिर से हरा हो गया। उनकी कमी ने यह साबित कर दिया कि एक फिल्म को हिट अभिनेता बना सकते हैं, लेकिन उसे ‘कल्ट’ और ‘अमर’ सिर्फ एक महान लेखक ही बना सकता है। सच तो यह है कि ‘भूत बंगला’ को देखकर हर प्रशंसक के दिल से बस यही दुआ निकलती है-काश! नीरज वोरा आज हमारे बीच होते।
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