
फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट अक्सर अपनी फिल्मों के जरिए दर्शकों को डराने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन हाल ही में उन्होंने अपने जीवन के एक ऐसे वास्तविक और खौफनाक अनुभव को साझा किया है जिसने उन्हें भीतर तक हिलाकर रख दिया। पिछले साल दिसंबर में धोखाधड़ी के एक मामले में गिरफ्तारी और फिर उदयपुर जेल में बिताए गए समय के दौरान, विक्रम भट्ट एक गंभीर स्वास्थ्य संकट से गुजरे। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से जेल की सलाखों के पीछे की उस भयावह रात और तंत्र की संवेदनहीनता का खुलासा किया है।
जेल की सर्द रात और वह खौफनाक बुखार
विक्रम भट्ट ने इंस्टाग्राम और फेसबुक पर अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि यह जनवरी के मध्य की बात है जब वह उदयपुर सेंट्रल जेल की बैरक नंबर 10 में बंद थे। राजस्थान की कड़ाके की ठंड और जेल की बेबसी के बीच एक रात अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्होंने लिखा, ‘जेल में घड़ियां नहीं होतीं, इसलिए मुझे सही समय तो नहीं पता, लेकिन मुझे याद है कि मैं अचानक उठा और मेरा शरीर बुरी तरह कांप रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि मेरा शरीर आग की तरह तप रहा है।’ विक्रम ने बताया कि उनके पास तापमान मापने का कोई साधन नहीं था, लेकिन ठंड और कंपकंपी इतनी तेज थी कि दो कंबलों में लिपटे होने के बाद भी उनका शरीर शांत नहीं हो रहा था। उनकी हालत देख उनके पास सो रहे अन्य कैदियों ने दो और कंबल लाकर उनके ऊपर डाल दिए, लेकिन चार कंबलों के नीचे भी उनकी कंपकंपी कम नहीं हुई। उन्होंने एक पैरासिटामोल की गोली ली और उम्मीद की कि सुबह तक सब ठीक हो जाएगा।
व्यवस्था की लापरवाही और अस्पताल जाने का इंतजार
अगली सुबह जब उन्हें जेल के अस्पताल ले जाया गया, तो वहां का अनुभव और भी चौंकाने वाला था। विक्रम के अनुसार, वहां डॉक्टर मौजूद नहीं थे और अस्पताल में थर्मामीटर तक नहीं था। स्वास्थ्य कर्मियों ने केवल ऑक्सीजन लेवल चेक किया और उन्हें ‘ठीक’ बता दिया, जबकि वह बुखार से बेहाल थे। बाद में जब डॉक्टर आए, तो उन्होंने विक्रम की स्थिति को गंभीर मानते हुए उन्हें बाहर के अस्पताल ले जाने की सिफारिश की, लेकिन विडंबना यह रही कि डॉक्टर के आदेश के बावजूद उन्हें कई दिनों तक अस्पताल नहीं ले जाया गया। विक्रम भट्ट ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बहानेबाजी की, कभी पुलिस बल वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त था तो कभी आदिवासी मेले के प्रबंधन में। उन्होंने लिखा, ‘दिन दर दिन मैं बैरक में दर्द और बुखार के साथ तड़पता रहा। मुझे एहसास हो गया था कि मुझे कहीं नहीं ले जाया जा रहा है।’
आस्था का सहारा और चमत्कारिक सुधार
जब चिकित्सा सहायता की उम्मीद खत्म हो गई तो विक्रम भट्ट ने खुद को भगवान के भरोसे छोड़ दिया। उन्होंने जेल में ही तेल और नमक खाना छोड़ दिया, अधिक पानी पीना शुरू किया और बैरक में लगी देवी की एक तस्वीर के सामने प्रार्थना करने लगे। उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए लिखा, ‘मैंने प्रार्थना की कि मुझे यहां मत मरने देना, मेरे बच्चों, पत्नी और 90 वर्षीय पिता को मेरी जरूरत है।’ विक्रम ने बताया कि उनके वकील जब उनसे मिलने आए तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि उन्हें लगता है कि वे जेल में ही मर जाएंगे। हालांकि धीरे-धीरे उनकी प्रार्थनाओं का असर दिखने लगा और बिना किसी बाहरी इलाज के उनका बुखार कम होने लगा और दर्द भी कम हो गया।
15 दिन बाद आई पुलिस और कड़वा सच
जब वह पूरी तरह ठीक हो गए, उसके 15 दिन बाद पुलिस अधिकारी उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए आए। इस पर विक्रम भट्ट ने तंज कसते हुए उनसे कहा, ‘सज्जनों आप 15 दिन की देरी से आए हैं। शायद आप मेरा भूत देख रहे हैं।’ जब उन्होंने बाद में एक अधिकारी से पूछा कि अगर यह कोई इमरजेंसी होती तो वे क्या करते तो अधिकारी का जवाब और भी विचलित करने वाला था। अधिकारी ने सहजता से कहा, ‘तब हम आपको जेल प्रहरियों के साथ भेज देते।’ इस जवाब ने विक्रम को सोचने पर मजबूर कर दिया कि प्रशासन उन्हें पहले भी भेज सकता था, लेकिन शायद उन्होंने ऐसा न करने का फैसला किया था।
मामला क्या था?
विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट को दिसंबर 2023 में राजस्थान पुलिस ने मुंबई से गिरफ्तार किया था। उन पर उदयपुर के एक व्यवसायी डॉ अजय मुदिया के साथ 30 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी करने का आरोप लगा था। यह गिरफ्तारी इंदिरा ग्रुप ऑफ कंपनीज द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर की गई थी। लगभग दो महीने जेल में बिताने के बाद इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने दंपति को जमानत दे दी थी। अब बाहर आने के बाद विक्रम भट्ट ने जेल के उन अंधेरे दिनों और अपनी जान पर आए संकट की कहानी दुनिया के सामने रखी है।
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