
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई अभिनेत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब जीतकर देश का मान बढ़ाया है, लेकिन इन पुरस्कारों की सूची में एक ऐसा नाम भी शामिल है जो सबको हैरान कर देता है। यह सम्मान किसी महिला को नहीं, बल्कि एक पुरुष अभिनेता को मिला था, जिन्होंने एक किन्नर के किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि दुनिया उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री मान बैठी। आज ये एक्टर भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन इनकी एक्टिंग का लोहा पूरी फिल्म इंडस्ट्री मानती है। खास तौर पर उनके इस किरदार की जमकर सराहना की जाती है।
एक अनोखा अंतरराष्ट्रीय सम्मान
भारतीय फिल्मों में कमल हासन (चाची 420), गोविंदा (आंटी नंबर 1) से लेकर नवाजुद्दीन सिद्दीकी और अक्षय कुमार जैसे सितारों ने क्रॉस-ड्रेसर या ट्रांसजेंडर की भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन इनमें से कोई भी वह उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया जो दिवंगत अभिनेता निर्मल पांडे के नाम दर्ज है। 90 के दशक में ‘औजार’ और ‘गॉडमदर’ जैसी फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाने वाले निर्मल पांडे ने अपने करियर की शुरुआत में अमोल पालेकर की फिल्म ‘दायरा’ (1996) में काम किया था। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे ट्रांसजेंडर का किरदार निभाया जिसे एक यौन शोषण की शिकार महिला से प्रेम हो जाता है। 1997 में फ्रांस के वैलेंसिएन्स फिल्म फेस्टिवल में एक ऐतिहासिक पल आया, जब निर्मल पांडे को उनकी सह-कलाकार सोनाली कुलकर्णी के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। किसी भारतीय पुरुष अभिनेता द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने की यह पहली और इकलौती घटना थी, जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया।
निर्मल पांडे।
भारत में क्यों नहीं रिलीज हो पाई ‘दायरा’?
हैरानी की बात यह है कि जिस फिल्म ने दुनिया भर में वाहवाही बटोरी, वह भारत के सिनेमाघरों तक कभी नहीं पहुंच सकी। अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित ‘दायरा’ अपनी बोल्ड थीम और महिलाओं के खिलाफ अपराधों जैसे संवेदनशील विषयों पर आधारित थी। सेंसर बोर्ड ने फिल्म के कुछ संवादों और सीन्स को अश्लील बताते हुए उन्हें हटाने का निर्देश दिया था। काफी जद्दोजहद के बाद अगस्त 1996 में फिल्म को ए सर्टिफिकेट तो मिला, लेकिन वितरकों की कमी या कई और विवादों के कारण यह थिएटर में रिलीज नहीं हो पाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी सराहना मिलने के कुछ साल बाद भारत में इसे सीधे डीवीडी पर जारी किया गया।
एक बहुमुखी अभिनेता का सफर
1962 में जन्मे निर्मल पांडे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के छात्र थे। अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद वह लंदन चले गए जहां उन्होंने थिएटर में काम किया। भारत लौटने पर उन्होंने 1994 में शेखर कपूर की प्रसिद्ध फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ से डेब्यू किया, जिसमें उन्होंने डकैत विक्रम मल्लाह की भूमिका निभाई थी। निर्मल पांडे अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जाने जाते थे। जहां एक ओर उन्होंने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और ‘वन 2 का 4’ जैसी फिल्मों में खूंखार विलेन के रोल किए, वहीं ‘हद कर दी आपने’ जैसी फिल्मों में अपनी कॉमेडी से दर्शकों को गुदगुदाया भी। दुर्भाग्यवश साल 2010 में महज 47 साल की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम फिल्म ‘लाहौर’ उनके निधन के बाद रिलीज हुई थी। आज भी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा के गौरवशाली पलों की बात होती है तो निर्मल पांडे का यह सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री वाला पुरस्कार एक अद्भुत मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
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